छठ का पावन पर्व नजदीक आ रहा है और मेरे अन्दर का बाल मन बहुत खुश है. पुरानी
यादें ताज़ी हो रही हैं...तब शायद नवम्बर का महीना हुआ करता था. बहुत जोरों की
ठण्ड पड़ा करती थी. हम सारे भाई बहिन सांझ के अर्घ्य के समय भी फुल स्वेटर पहन कर
छठ घाट जाया करते थे. एक उल्लास होता था मन में...छठ की तैयारियां तो किश्तों में
महीने डेढ़ महीने पहले ही शुरू हो जाती थी, शायद दसहरे के समय ही. छठ की
तैयारियो में नए कपड़े और दिवाली के बचे हुए पटाखों का अपना ही आनंद था...दिवाली
की रात ख़त्म भी ना होती और हम सभी सुबह सवेरे निकल पड़ते उन पटाखों की तलाश में
जो शायद कभी फटे ही ना हो. पटाखे तो नए भी होते थे पर जो मजा उन पुराने पटाखों को
चुन कर लाने और उन्हें धुप में सुखा कर, सहेज कर रखने में था वो शायद
नए में नहीं. एक अलग ही दुनिया थी हमारी. समय मिला तो कभी विस्तार से दिवाली के
बचे हुए पटाखों और बुझे हुए दीयों पर लिखूंगा.
छठ एक बड़ा पर्व था, आज भी है, पर अब छठ ग्लोबल हो गया है.
लोग अब जहाँ हैं वही मनाने लगे हैं. कोई मुंबई तो कोई चेन्नई. हमारी दिल्ली भी
इससे अछूती नहीं है. राजनीती भी होने लगी है छत के नाम पर. एक स्वस्थ बहस तो होनी ही चाहिए इस राजनिति पर - क्या, अब किसी भारतीय को देश के
किसी कोने में अपने मुताबिक रहने और पूजा करने की आजादी से भी रोका जायेगा! आखिर
हम "अतिथि देवो भवः" की अपनी संस्कृति को कहा ले जा रहे हैं! खैर…
पहले हम सभी गाँव में मिलजुल कर छठ मनाते थे. सभी होते थे - माँ, पापा, दादा जी (बाबा), दादी जी (जिन्हें हम प्यार
से इया भी कहते थे), चाचा, चाची, भाई बहन. हमारी छोटी वाली बुआ और ढेर
सारे लोग...बुआ तो सिवान से गोपालगंज आ जाती थीं हमारे साथ छठ मनाने के लिए.
परिवार के सभी लोग साथ में मनाते. पूजा की तैयारियां तो दिवाली के दिन से ही शुरू
हो जाती थी. पुरे छः दिनों का पर्व! दिवाली की रात में माँ और इया मिलकर मिट्टी का चूल्हा तैयार करते थे. अगले दो दिनों तक, शायद भाई-दूज के दिन तक वो
सुख कर तैयार हो जाता था. मिट्टी के चूल्हे पर ही छठ का सारा प्रसाद बनता था पर अब
उसकी जगह गैस चूल्हे ने ले ली है. पड़ोस की दादी कोहड़ा दे जाती, तो दो घर बाद वाली दादी साठी धान. साठी धान के चिवड़े का बहुत महत्व होता था. अब तो कोई भी धान मिल जाये, काम चल जाता है. धान ना हो
तो बाजार से ही चिवड़ा मंगा लिया. इस काम चल जाने वाले प्रवृति की वजह से हमारी
संस्कृति का काफी नुकसान हुआ है. हमारी दादी भी हमें लौकी देती थी, पड़ोसिओं को देने के लिए.
अपनी चीजों को दूसरों के साथ शेयर करना शायद यही से सीखा होगा.
तब मैं थोड़ा छोटा था, पर माँ रसोई घर से ही आवाज लगाती, जरा कोहड़ा तो पटक कर फोड़
देना, तो छोटी बुआ बोलती की तू ठेकुआ का आटा गूँथ दे. अभी ये काम ख़तम भी ना होता की
बड़े चाचा की आवाज सुनाई देती घर के आँगन से, चलो भाई चलो, उँख काटने चलो. उँख एक ठेठ
भोजपुरी शब्द है जिसे शहरों में कही गन्ना तो कही केतारी कहते हैं. अभी-अभी चेन्नई से लौट के आया हूँ इसलिए याद करने की कोशिश कर रहा हूँ की वह पे
इसे क्या कहते हैं. नहीं याद आने पर, अपने ऑफिस के एक साथी से
पूछा तो पता चला की वहा पे इसे करुम्बू कहते
हैं.
लड़कपन की हुल्लड़बाजी में कब पांच दिन बीत जाते पता ही नहीं चलता की छठ का दिन
आ जाता. वो दिन जिसका महीने पहले से बेसब्री से इंतज़ार होता. नए कपड़े, ढेर सारे पटाखे, छठ के घाट जाना और वहा का
मेले जैसा माहौल – आह, क्या कहने उन दिनों के! हम सभी छठ के घाट पहुँचते. हमारे बाबा सबसे आखिर में घर से निकलते घाट पर आने
के लिए! घाट पर चारो तरफ मेले जैसा माहौल, बड़े बड़े गुब्बारे, तरह तरह के खिलौने और ढेर सारी
खाने की चीजें. साथ में छठ के पावन गीत जो व्रत करने वाली गाती और पूजा पंडालों के
लाऊड-स्पीकर से भी निकल कर आते. पद्म श्री शारदा सिन्हा और शायद
मनोज तिवारी की आवाज होती, "की जय हो छठी मईया, दिहीं ना आशीष", “कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए, मरबो रे सुगवा धनुष से, सुगा गिरे मुरझाये”, और भी गाने होते, बहुत अच्छे लगते थे! सूरज डूबने का इंतज़ार करती छठ की व्रतियाँ पास के तालाबों में खड़ी रहती
सांझ अर्घ्य के लिए! शायद दुनिया में एक मात्र ऐसा पर्व जिसमें डूबते हुए सूर्य को
नमस्कार किया जाता है. सूरज की लालिमा आकाश में विलीन होती और पंडित जी अर्घ्य दिलवाते, हम भी खड़े होते साथ में! अर्घ्य के बाद हमें अक्षत
मिलता जो हम चारों दिशाओं में फेंक कर प्रणाम करते और फिर तैयारी घर लौटने की! घर
आते ही कोशी भरने की तैयारियां. कहीं एक चौबीसा तो कहीं पर दो चौबीसा! और कोशी भराई
के साथ गीत… “की करीले छठ व्रतिया की केकरा लागे” - हमारे नाम का भी गीत गाया जाता. मन रोमांचित हो उठता जब
घर की औरतें हमारे नाम से भविष्य में होने वाली हमारी पत्नी के लिए भी आशीष
मांगती.
और फिर, सुबह समय पे उठने के लिए जल्दी से खा कर सोने की तैयारी. सुबह में सबसे पहले
माँ, इया, फुआ और दीदी जगते. माँ और इया तो अपनी-अपनी तयारी पूरी कर के निकल
पड़ते छठ माई के घाट पर और बाकी दोनों लग जाते सुबह का पारण बनाने में. दीदी बीच-बीच में आकर हमें आवाज मार जाती - चलो भाई, जल्दी करो, उठ जाओ, घाट पर जाना है. हम रजाई में
से अनमनाते हुए निकलते! भोर (सूर्योदय होने के पहले का सवेरा) में छठ घाट जाते समय
दूर रास्ते से ही सुन्दर गीत सुनाई देने लगते - "जल्दी-जल्दी उगीं हे सुरुज देवा, छठी मैया की जय". सूर्य भगवान दर्शन देते, और व्रतियाँ उनको अर्घ्य! छठी मैया से अगले साल फिर आने का वादा कर परिवार की सुख-समृधि के लिए आशीष मांग कर अपना व्रत तोड़ती. अब आती, प्रसाद की बारी, सभी को प्रसाद, जो सामने मिल जाये. चाहे
अपने घर का हो या गाँव का. हम लोग भी घूम घूम कर सबसे प्रसाद लेते! आपसी सौहार्द
का बड़ा अच्छा माहौल बनता! इस तरह, छठ का पावन पर्व अपने आखिरी
पड़ाव पर पहुच जाता.
छठ आज भी मनाता हूँ, कोशिश करता हूँ की हर साल परिवार के साथ मनाऊं. पर अब लड़कपन
वाली हंसी ठिठोली नहीं रही! अब हमारे घर, गाँव में छठ नहीं मनाया
जाता, जब से बाबा गुजरे हैं. नौ साल हो गए गाँव में छठ नहीं मनाई - मन तो बहुत करता
है, पर अपनी-अपनी मजबूरियां हैं. कुछ घर की तो कुछ गाँव की. गाँव में अब
शायद वह पुरानी बात होगी या नहीं पता नहीं - क्यों की छठ अब ग्लोबल हो गया है, लोग समय का महत्त्व कुछ ज्यादा ही समझने लगे हैं! सोचते होंगे, ऑफिस से छुट्टी लेकर टाइम और
पैसे की बर्बादी क्यों की जाए - सारे सोचते होंगे, ये मैं नहीं कहता, पर विगत के वर्षों में कुछ
लोगो से अपने व्यकिगत मुलाकातों पर कह रहा हूँ, की कुछ तो ऐसा जरुर सोचते
हैं!
हमारे घर छठ अब देवघर में मनाई जाती है. अच्छा लगता है - परिवार के साथ, एक साथ मिल कर त्यौहार
मनाना. पर काश, कभी ये कोई समझ पता की आज भी
गाँव में छठ मनाने का मन करता है. छठी मईया आशीष दें, फिर लौटूंगा अपने गाँव के
घाट पर, छठ मनाने के लिए...मन फिर लौट रहा है पुरानी यादों में – कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…